Wednesday, January 6, 2016

"स्त्री तब तक 'चरित्रहीन' नहीं हो सकती, जब तक पुरुष चरित्रहीन न हो "- गौतम बुद्ध

"स्त्री तब तक 'चरित्रहीन' नहीं हो सकती....
जब तक पुरुष चरित्रहीन न हो "...... गौतम बुद्ध
===========================

       संन्यास लेने के बाद गौतम बुद्ध ने अनेक क्षेत्रों की यात्रा की...
एक बार वह एक गांव में गए। वहां एक स्त्री उनके पास आई और
बोली- आप तो कोई "राजकुमार" लगते हैं। ...क्या मैं जान सकती हूं
कि इस युवावस्था में गेरुआ
वस्त्र पहनने का क्या कारण है ?

...बुद्ध ने विनम्रतापूर्वक उत्तर
दिया कि...

 "तीन प्रश्नों" के हल ढूंढने के लिए
उन्होंने संन्यास लिया.. बुद्ध ने कहा.. हमारा यह शरीर
जो युवा व आकर्षक है, पर जल्दी ही यह "वृद्ध" होगा, फिर "बीमार" और ....अंत में "मृत्यु" के मुंह में चला जाएगा। मुझे 'वृद्धावस्था',
'बीमारी' व 'मृत्यु' के कारण का ज्ञान
प्राप्त करना है .....
बुद्ध के विचारो से प्रभावित होकर उस स्त्री ने उन्हें भोजन के लिए आमंत्रित किया....
शीघ्र ही यह बात पूरे गांव में फैल गई। गांव वासी बुद्ध के पास आए व आग्रह किया कि वे इस स्त्री के घर भोजन करने न जाएं....!!!

क्योंकि वह "चरित्रहीन" है.....
बुद्ध ने गांव के मुखिया से पूछा ?
.....क्या आप भी मानते हैं कि वह स्त्री चरित्रहीन है...?
मुखिया ने कहा कि मैं शपथ लेकर कहता हूं कि वह बुरे चरित्र वाली स्त्री है....। आप उसके घर न जाएं।

बुद्ध ने मुखिया का दायां हाथ पकड़ा... और उसे ताली बजाने को कहा... मुखिया ने कहा...मैं एक हाथ से ताली नहीं बजा सकता...
"क्योंकि मेरा दूसरा हाथ
आपने पकड़ा हुआ है"... 
बुद्ध बोले...इसी प्रकार यह
स्वयं चरित्रहीन कैसे हो सकती है...????
... जब तक इस गांव के "पुरुष चरित्रहीन" न हों...!!!!अगर गांव के
सभी पुरुष अच्छे होते तो यह औरत
ऐसी न होती इसलिए इसके चरित्र के लिए यहां के पुरुष जिम्मेदार हैं....यह सुनकर सभी "लज्जित" हो गए.....
....लेकिन आजकल हमारे समाज के पुरूष "लज्जित" नही "गौर्वान्वित" महसूस करते है.....
... क्योकि यही हमारे "पुरूष प्रधान" समाज की रीति एवं नीति है..॥

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

वर्तमान हिन्दू धर्म,वैदिक ब्राह्मणों ने बौद्ध धर्म से चुराया और अपना लेबल चिपकाकर मार्किट में उतारा है

!!! Jai bhim Namo buddhay !!!
*****************************

"कहीं हम भूल न जाएँ"

👉 वर्तमान हिन्दू धर्म,वैदिक ब्राह्मणों ने बौद्ध धर्म से चुराया और अपना लेबल चिपकाकर मार्किट में उतारा है.....

1)गुरु पूर्णिमा- 
गौतम बुद्ध ने आषाढ़ पूर्णिमा के दिन सारनाथ में प्रथम बार पांच परिज्रावको को दीक्षा दी थी। ये दिन बौद्धों के जीवन में गुरु पूर्णिमा के नाम से जाना जाता था।
बौद्ध धर्म समाप्त करने के बाद ब्राह्मण धर्म के ठेकेदारो ने इस पर कब्ज़ा किया।

2) कुम्भ का मेला-
कुम्भ का मेला बौद्ध सम्राट हर्षवर्धन ने शुरू करवाया था जिसका उद्देश्य बुद्ध की विचारधारा को फैलाना था। इस मेले में दूर दूर से बौद्ध भिक्षु,श्रमण,राजा,प्रजा,सैनिक भाग लेते थे।
बौद्ध धर्म समाप्त करने के पश्चात ब्राह्मणों ने इसको अपने धर्म में लेकर अन्धविश्वास घुसा दिया।

3)चार धाम यात्रा-
बौद्ध धर्म में चार धामों का विशेष महत्त्व था। ब्राह्मणों ने बौद्ध धर्म के चार धामो को अपने काल्पनिक देवी-देवताओ के मंदिरो में बदल दिया और अपने धर्म से जोड़ दिया।

4)जातक कथाएँ-
जातक कथाये बौद्ध धर्म में विशेष महत्त्व रखती है। इन कथाओ द्वारा बौद्धिस्ट की दस परमिताओं को समझाया जाता था। कुछ कथाये गौतम बुद्ध काल की और कुछ बाद की लिखी गयी है। 
बौद्ध धर्म समाप्त करने के पश्चात ब्राह्मणों ने इन कथाओ का ब्रह्मणिकरण करके अपने धर्म में लिया और इन कथाओ में कुछ काल्पनिक कथाये,कुछ ऐतिहासिक बौद्ध स्थलो को जोड़कर रामायण और महाभारत की रचना की गयी।

 5)विजयादशमी-
सम्राट अशोक ने कलिंग विजय के पश्चात अश्विन दशमी के दिन बौद्ध धम्म स्वीकार किया था। ये दिन विजयदशमी के रूप में जाना जाता था।
इसी दिन ब्राह्मण पुष्यमित्र शुंग ने मौर्य सम्राट बृहदर्थ मौर्य की हत्या की थी। मौर्य सम्राट दस परमिताओं का रक्षक था। दस परमिताओं का रक्षक हार गया-दशहरा 
बौद्ध धर्म समाप्त करने के पश्चात ब्राह्मणों ने इस दिन को काल्पनिक कथा रामायण के राम-रावण से जोड़कर दशहरा बना दिया।
तुलसीदास की रामचरितमानस के अनुसार रावण चैत्र के महीने में मारा गया था।

6) दीपदानोत्सव -
a)गौतम बुद्ध को ज्ञान प्राप्त होने के पश्चात जब गौतम बुद्ध कपिलवस्तु आये थे तो उनके पिता ने उनके आने की ख़ुशी में नगर को दीपो से सजाया था।
7) सम्राट अशोक ने 84000 बौद्ध स्तूप/चैत्य/विहार बनवाये थे। इन स्तूप/चैत्य/विहारों का उदघाटन कार्तिक अमावस्य के दिन दीप जलाकर किया था और ये दिन दीपदानोत्सव के नाम से जाना जाता था। क्योंकि ये चैत्य/विहार/स्तूप भारतवर्ष में ही थे इसलिए ये त्यौहार केवल भारत तक ही सिमित था।
बौद्ध धर्म समाप्त करने के पश्चात ब्राह्मणों ने इस त्यौहार को काल्पनिक कथा रामायण के पात्र राम से जोड़ दिया।

8)लिंग-योनि की पूजा पुष्यमित्र शुंग की प्रतिक्रांति के बाद प्रथम शताब्दी में शुरू हुई-
 ब्राह्मणों ने बौद्धों से कहा कि ईश्वर है जिसने ये संसार बनाया है और तुम्हे भी बनाया है। बौद्धों ने ब्राह्मणों से कहा कि ईश्वर कल्पनामात्र है। ये दुनिया लिंग-योनि की क्रिया के कारण पैदा हुई है और प्राकृतिक है।
ब्राह्मणों ने प्रतिक्रिया स्वरूप बौद्धों से ताकत के बल पर लिंग-योनि की मूर्ती पूजवाई। बाद में इसको मनगढ़ंत कहानी द्वारा पुराणों में शिव से जोड़ दिया और अंधविश्वासी लोग लिंग-योनि को शिव-लिंग मानकर पूज रहे है।

9)ब्राह्मणों के व्यावसायिक केंद्र-
आज जहाँ-जहाँ पर ब्राह्मणों के काल्पनिक देवी-देवताओ के बड़े-बड़े मंदिर है वहाँ कभी बौद्ध धर्म के केंद्र होते थे,जैसे-अयोध्या, काशी,मथुरा,पूरी,द्वारका,रामेश्वरम,केदारनाथ,बद्रीनाथ,तिरुपति, पंढरपुर ,शबरिमला आदि।
बौद्ध धर्म समाप्त करने के पश्चात ब्राह्मणों ने उन्हें मंदिरो में बदल दिया। 
आप जाकर देखिये वर्तमान में तिरुपति बालाजी के मंदिर में मूर्ति स्वयं गौतम बुद्ध की है।इस बौद्ध मंदिर पर ब्राह्मणों ने कब्ज़ा करके बुद्ध को आभूषण और कपडे पहना दिए और उसका नाम अलग-अलग रख दिया। कोई इसको बालाजी,कोई वेंकटेश्वर, कोई शिव,कोई हरिहर,कोई कृष्ण,कोई शक्ति बोलता है।

10) पीपल की पूजा-
भारत के मूलनिवासी प्रकृति पूजक थे। पीपल के पेड़ के नीचे गौतम बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था इसलिए पीपल की पूजा का महत्त्व और भी बढ़ गया था। ब्राह्मणों ने बौद्ध धर्म समाप्त करने के पश्चात पीपल के पेड़ के नीचे एक पत्थर गाड़ दिया और इसे पिपलेश्वर महादेव बना दिया।

 11)वट वृक्ष की पूजा-
गौतम बुद्ध ने पहला उपदेश सारनाथ में वट वृक्ष के नीचे दिया था इसलिए लोग वट वृक्ष को भी पूजने लगे थे।
बौद्ध धर्म समाप्त करने के पश्चात ब्राह्मणों ने इसे अपने धर्म में लेकर सत्यवान- सावित्री की काल्पनिक कथा से जोड़ दिया।

12) सिर का मुंडन-
बौद्ध भिक्षु अपने सिर के बाल मुंडवाकर रखते थे। बौद्ध धर्म समाप्त करने के पश्चात ब्राह्मणों ने बौद्ध धर्म के प्रति नफरत फैलाने के लिए मृत्यु के पश्चात परिवार के लोगो का सिर मुड़वाने की प्रथा की शुरुवात की ।।

 👉ये लेख  ब्राह्मणवाद की विकृति दर्शाता है...।

Tuesday, January 5, 2016

बौद्ध जगत के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारी

बौद्ध जगत के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारी miss मत कीजिए कृपया जरूर पढ़े
👪👪👪👭👬👪👪👪
आज दुनिया के अलग अलग देशों में बौद्ध जनसंख्या के सटीक आंकडे उपलब्ध है।
यह जानकारी उपयुक्त सभी संबधित अलग अलग देशों में किये गये studies और investigation पर आधारित हैं।
जिसमें लोगों ने कबूल किया, कि उनका बौद्ध धम्म पर पूरा विश्वास है, और वह उसकी practice करते हैं।वो अपने आप को बुध्दीष्ट घोषित करते हैं।
इन अध्ययनों के नतीजे वर्ष 2010-2013 के मध्य में प्रकाशित हुए थे।
("China Beliefs"
Justchina.org.,2011;)
("China Culture Exploring Assistant",
China business
Interpreter.com,2011)
(CIA The World Fact book: Populations as
of July 2013)
(The Dhamma Encyclopedia-
Buddhism in the World).
यह estimates संबंधित अलग-अलग देशों में बौद्ध जनसंख्या की सच्ची स्थिति को दर्शाते है।
[ 1 billion = 100 करोड़ ]
July 2010 में बौद्ध जनसंख्या का estimated 1.6 billion (1,595,485,458) लगभग
(160 करोड़) के करीब था।
जो कि दुनिया की जनसंख्या का 22% हिस्सा है।
इसे स्वतंत्र estimate के तौर पर सुचित किया गया है।
स्वतंत्र estimate अनुसार चीन की वर्तमान जनसंख्या में over one billion (1,070,893,447) [ 107 करोड़ से भी ज्यादा ] बौद्ध धम्म की जनसंख्या है।
यह दुनिया की बौध्द आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा है।
यह बात उपर दिये गये संदर्भो से प्रमाणित होती है।
इसके अलावा
(China's Buddhist population in U.S State Department Report on China) ,
(Global Center for the Study of Contemporary China) ,
(China Daily)
और
(a report by Christian missionaries in China).
इन स्त्रोतों से पता चलता है, कि इनके द्वारा किये गए निरीक्षण में चीन के 80% से 90% लोगों ने अपनी पहचान Buddhism के साथ जोडी हैं।
तथा उसकी परंपरा पर पुरा विश्वास प्रकट किया है।
और हाल ही में हुए कुछ अध्ययन दर्शाते है, कि चीन के 98% लोग खुद को Buddhist मानते है।
पर साथ ही साथ चीन की अनेक अध्यात्मिक परंपरा पर भी विश्वास जताया।
(www.thedhamma.com/buddhist_in_the_world.htm, The Dhamma Encyclopedia, Definition of a Buddhist by David N.Snyder).
Buddhist Population Of Selected Countries[ 1 million=10 लाख ]
चीन over 1 billion
80% (1,070,893,447 Buddhist)
जापान 122 million (96%)
वियतनाम 70 million (75%)
थायलँड 64 million (95%)
म्यांमार 49.7 million (90%)
भारत 36.6 million (03%)
साउथ कोरिया 24.5 (50%)
तायवान 21.7 million (93%)
श्रीलंका 15.2 million (70%)
कंबोडिया 14.7 million (97%)
हाँगकाँग 6.4 million (90%)
मलेशिया 6.2 million (21%)
अमेरिका 6 million (02%)
लाओस 5 million (67%)
इंडोनेशिया 4.3 million (01.7%)
नार्थ कोरिया 3.4 million (14%)
नेपाल 3.3 million (11.5%)
मंगोलिया 3 million (93%)
सिंगापुर 2.8 million (51%)
फिलीपीन्स 2 million (01.5%)
रशिया 2 million (01.4%)
कॅनडा 1.2 million (03.5%)
बांग्लादेश 1.1million (00.7%)
फ्रांस 1million (01.5%)
ब्राजील 1million (0.5%)
जर्मनी 905,657 (01%)
इंग्लैंड 760,747 (01%)
भुटान 609,249 (84%)
ब्रुनेई 58,498 (17%)
(Near Malaysia)
मकाउ 466,402 (75%)* सिक्किम 171,000 (28%)**
लद्दाख 125,000 (45%)***
ऑस्ट्रेलिया 528,977 (2.5%) (2011)
स्पेन (300,000)
नेदरलँड (201,660)
इटली (122,965)
मॅक्सीको (108,700)
कोस्टारिका (96,733)
पेरू (89,500)
उज्बेकिस्तान (85,985)
स्विझरलँड (79,960)
टर्की (71,159)
पनामा (68,000)
वेनेजुएला (56,000)
अर्जेंटिना (42,600)
ओमान (32,049)
चिली (17,200)
सौदीअरब 414,016 (1.5%)
कुवैत 100,222 (4%)
न्यूझीलँड 58,404 (1.50%)
कतर 45,361 (5%)
यु.ए.ई (5%)
बहरीन (2%)
लेबनान (2.1%)
बर्नोयस (16.8%)
नाॅर्थ मारियन (15.6%)
नौरू (11.9%)
गूआम (3.8%)
फ्रेंच गूयाना (3.6%)
माॅरेशियस (2.1%)
क्रिसमस आईसलँड 1,554 (75%)
(Territory of Australia)
चीन में 240,000 से ज्यादा भिक्खू और भिक्खूनीया है।
28,000 से बौद्ध मठ (monasteries) है, 16,000 से ज्यादा बौद्ध विहार है।बौद्ध वास्तूकला की अमिट छाप चीन पर दिखाई देती है। चीन ने अधिकारिक तौर पर कहा है, कि बौद्ध धम्म चीन अभिन्न अंग है।
हाल ही में 16 से 18 ऑक्टोंबर 2014 को चीन में हुई, 27th वी World Fellowship Of Buddhist (WFB) विश्व बौध्द भातृसंघ की आंतरराष्ट्रीय षरिषद हुई।
जीसका मुख्यालय थायलँड मैं है, इसके 35 देशों में 140 रिजनल सेंटरस् हैं।
इस (WFB) की षरिषद में 40 देशों के 600 प्रतिनिधि शामिल हुए थे।
जिसमें सारे प्रतिनिधीयों ने एकमत से प्रस्ताव पारित किया कि, सारे बौद्ध देश आपस में मजबूत सहबंध, एकता और भाईचारा बनाएंगे।
तथा सब विश्व शांति,मानवी कल्याण और समाज सेवा के लिए बौद्ध धम्म का प्रचार-प्रसार करेगें।
चीन ने विश्व में सबसे मजबूत बौद्ध राष्ट्र के नाते जिम्मेदारी ली है, कि वह विश्व में बौद्ध धम्म फैलाने में अगुवाई करेंगा।
तथा आंतरराष्ट्रीय तौर पर उसको समर्थन देंगा।बौद्ध धम्म और उसकी मान्यताएं,मूल्यों तथा परंपरा को सुरक्षित करेंगा।
इस परिषद में सब देशों ने मिलकर काम करने की,तथा बौद्ध धम्म की धरोहर को संरक्षित करने और उसकी विचारधारा को फैलाने के लिए प्रतिबद्ध होने का वचन दिया।
इस परिषद में Buddhist Association Of China (BAC) के अध्यक्ष मास्टर चाउनईन ने कहा, यह परिषद milestone साबित होंगी। (WFB) और (BAC) मिलकर काम करेंगे।
तथा चीन आर्थिक रूप से बुध्दीष्ट राष्ट्रों की मदत करेंगा।
वहां बुनियादी ढांचे का विकास करेंगा, जैसे वह श्रीलंका में कर रहा है।
Dr.Daya Hewapathirane - Advisor to the President of Srilanka.
-Asia Tribune-
कुछ लोग कहने लगे हैं,कि अब हम भारत को विश्व गुरु बनाएंगे।
कौन कहता है, भारत विश्व गुरु नही है।वह हजारों सालों से विश्व गुरु रहा है, और आज भी है।
बौद्ध धम्म भारत की सच्ची विरासत, सभ्यता और संस्कृति है।
जीसे पूरी दुनिया ने स्वीकार किया है।
भारत की संस्कृति अब दुनिया की संस्कृति बन गई है।
पर अफसोस की ब्राह्मणवादीयों ने छल कपट, हिंसा और साम, दाम ,दंड,भेद की निती से भारत में जन्मे भारत के सच्चे धर्म को भारत से ही लगभग समाप्त कर दिया था।
डॉ.बाबासाहेब आंबेडकर कहते," सत्य भी कभी कभी हार जाता है,यह उसका ही उदाहरण है।
पर सत्य ज्यादा देर तक छुपाया नही जा सकता, 
भारत में बौद्ध धम्म की ऐसी लह़र आयेंगी की उसमे सब बह जाएंगे।जो उसके विपरीत जाएगा वो भी उसमें बह जाएंगा"।
भारत एक बार फिर बौद्धमय होंगा, जैसे सम्राट अशोक के समय 90% लोग बौद्ध थे।
अब तो यही कहेंना पडेंगा 
"जग में बुध्द का नाम है, यहीं भारत की शान है" 
इस msg को इतना फैला दो की भारत में इसकी सुनामी आ जाए

बुद्धं शरणम् गच्छामि

बुद्धं शरणम् गच्छामि

जो नित्य एवं स्थाई प्रतीत होता है, वह भी विनाशी है। जो महान प्रतीत होता है, उसका भी पतन है। जहाँ संयोग है वहाँ विनाश भी है। जहाँ जन्म है वहाँ मरण भी है। ऐसे सारस्वत सच विचारों को आत्मसात करते हुए महात्मा बुद्ध ने बौद्ध धर्म की स्थापना की जो विश्व के प्रमुख धर्मों में से एक है।

विश्व के प्रसिद्द धर्म सुधारकों एवं दार्शनिकों में अग्रणी महात्मा बुद्ध के जीवन की घटनाओं का विवरण अनेक बौद्ध ग्रन्थ जैसे- ललितबिस्तर, बुद्धचरित, महावस्तु एवं सुत्तनिपात से ज्ञात होता है। भगवान बुद्ध का जन्म कपिलवस्तु के पास लुम्बिनी वन में 563 ई.पू. में हुआ था। आपके पिता शुद्धोधन शाक्य राज्य कपिलवस्तु के शासक थे। माता का नाम महामाया था जो देवदह की राजकुमारी थी। महात्मा बुद्ध अर्थात सिद्धार्थ (बचपन का नाम) के जन्म के सातवें दिन माता महामाया का देहान्त हो गया था, अतः उनका पालन-पोषण उनकी मौसी व विमाता प्रजापति गौतमी ने किया था।

सिद्धार्थ बचपन से ही एकान्तप्रिय, मननशील एवं दयावान प्रवृत्ति के थे। जिस कारण आपके पिता बहुत चिन्तित रहते थे। उपाय स्वरूप सिद्धार्थ की 16वर्ष की आयु में गणराज्य की राजकुमारी यशोधरा से शादी करवा दी गई। विवाह के कुछ वर्ष बाद एक पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम राहुल रखा गया। समस्त राज्य में पुत्र जन्म की खुशियां मनाई जा रही थी लेकिन सिद्धार्थ ने कहा, आज मेरे बन्धन की श्रृंखला में एक कङी और जुङ गई। यद्यपि उन्हे समस्त सुख प्राप्त थे, किन्तु शान्ति प्राप्त नही थी। चार दृश्यों (वृद्ध, रोगी, मृतव्यक्ति एवं सन्यासी) ने उनके जीवन को वैराग्य के मार्ग की तरफ मोङ दिया। अतः एक रात पुत्र व अपनी पत्नी को सोता हुआ छोङकर गृह त्यागकर ज्ञान की खोज में निकल पङे।

गृह त्याग के पश्चात सिद्धार्थ मगध की राजधानी राजगृह में अलार और उद्रक नामक दो ब्राह्मणों से ज्ञान प्रप्ति का प्रयत्न किये किन्तु संतुष्टि नहीं हुई। तद्पश्चात निरंजना नदी के किनारे उरवले नामक वन में पहुँचे, जहाँ आपकी भेंट पाँच ब्राह्मण तपस्वियों से हुई। इन तपस्वियों के साथ कठोर तप किये परन्तु कोई लाभ न मिल सका। इसके पश्चात सिद्धार्थ गया(बिहार) पहुँचे, वहाँ वह एक वट वृक्ष के नीचे समाधी लगाये और प्रतिज्ञां की कि जबतक ज्ञान प्राप्त नही होगा, यहाँ से नही हटुँगा। सात दिन व सात रात समाधिस्थ रहने के उपरान्त आंठवे दिन बैशाख पूणिर्मा के दिन आपको सच्चे ज्ञान की अनुभूति हुई। इस घटना को "सम्बोधि" कहा गया। जिस वट वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ था उसे "बोधि वृक्ष" तथा गया को "बोध गया" कहा जाता है।

ज्ञान प्राप्ति के पश्चात महात्मा बुद्ध सर्वप्रथम सारनाथ(बनारस के निकट) में अपने पूर्व के पाँच सन्यासी साथियों को उपदेश दिये। इन शिष्यों को "पंचवगीर्य' कहा गया। महात्मा बुद्ध द्वारा दिये गये इन उपदेशों की घटना को 'धर्म-चक्र-प्रवर्तन' कहा जाता है। भगवान बुद्ध कपिलवस्तु भी गये। जहाँ उनकी पत्नी,पुत्र व अनेक शाक्यवंशिय उनके शिष्य बन गये। बौद्ध धर्म के उपदेशों का संकलन ब्राह्मण शिष्यों ने त्रिपिटकों के अंर्तगत किया। त्रिपिटक संख्या में तीन हैं-
1-विनय पिटक, 2-सुत्त पिटक, 3- अभिधम्म पिटक
इनकी रचना पाली भाषा में की गई है।हिन्दू-धर्म में वेदों का जो स्थान है, बौद्ध धर्म में वही स्थान पिटकों का है।

भगवान बुद्ध के उपदेशों एवं वचनों का प्रचार प्रसार सबसे ज्यादा सम्राट अशोक ने किया। कलिंग युद्ध में हुए नरसंहार से व्यथित होकर अशोक का ह्रदय परिवर्तित हुआ उसने महात्मा बुद्ध के उपदेशों को आत्मसात करते हुए इन उपदेशों को अभिलेखों द्वारा जन-जन तक पहुँचाया। भीमराव आम्बेडकर भी बौद्ध धर्म के अनुयायी थे।

महात्मा बुद्ध आजीवन सभी नगरों में घूम-घूम कर अपने विचारों को प्रसारित करते रहे। भ्रमण के दौरान जब वे पावा पहुँचे, वहाँ उन्हे अतिसार रोग हो गया था। तद्पश्चात कुशीनगर गये जहाँ 483ई.पू. में बैशाख पूणिर्मा के दिन अमृत आत्मा मानव शरीर को छोङ ब्रहमाण्ड में लीन हो गई। इस घटना को 'महापरिनिर्वाण' कहा जाता है। महात्मा बुद्ध के उपदेश आज भी देश-विदेश में जनमानस का मार्ग दर्शन कर रहे हैं। भगवान बुद्ध प्राणी हिंसा के सख्त विरोधी थे। उनका कहना था कि,
"जैसे मैं हूँ, वैसे ही वे हैं, और 'जैसे वे हैं, वैसा ही मैं हूं। इस प्रकार सबको अपने जैसा समझकर न किसी को मारें, न मारने को प्रेरित करें।"

भगवान् बुद्ध के सुविचारों के साथ ही मैं अपनी कलम को विराम देना चाहूंगी , "हम जो कुछ भी हैं वो हमने आज तक क्या सोचा इस बात का परिणाम है। यदि कोई व्यक्ति बुरी सोच के साथ बोलता या काम करता है, तो उसे कष्ट ही मिलता है। यदि कोई व्यक्ति शुद्ध विचारों के साथ बोलता या काम करता है, तो परछाई की तरह  ही प्रसन्नता उसका साथ कभी नहीं छोडती।"

बुद्ध --ग्यान

बुद्ध --ग्यान 
...................
[1] दुख: का ग्यान बुद्ध का ग्यान है |बुद्ध जानते है |
[2] दुख: उत्पत्ति का ग्यान बुद्ध का ग्यान है |
[3] दुख: नष्ट करने का ग्यान बुद्ध का ग्यान है |
[4] दुख:नष्ट करने के मार्ग का ग्यान बुद्ध का ग्यान है |
[5] अर्थ साहित बताने का ग्यान बुद्ध का ग्यान है |
[6] धर्म साहित बताने का  बुद्ध का ग्यान है |
[7] निरुक्त करने का मार्ग बुद्ध का ग्यान है |
[8] प्रत्युत्त समुत्पन्न बताने का बुद्ध का ग्यान है |
[9] इंद्रियों के परंपरा का ग्यान बताना बुद्ध का ग्यान है |
[10] आसव, अनासव नष्ट करने का बुद्ध का ग्यान है |
[11] यमक प्रतिहार्य (रिद्धिबल) बताने का बुद्ध का ग्यान है |
[12] महाकारूणक समापातिका ग्यान बुद्ध मे था |
[13]  अनावरण का ग्यान बुद्ध का ग्यान है |
[14]  सर्वोतोपरी, सर्व प्रकार से युक्त भगवान बुद्ध को ग्यान था | वह बुद्ध का ग्यान है |ये उपरोक्त सभी चौदासह भगवान बुद्ध के ग्यान है | उस संपूर्ण ग्यानी बुद्ध भगवान अर्हत सम्यक सम्बुद्ध को त्रीवार पंचान्ग प्रणाम है |
नमो बुद्धाय |
साधु   •  साधु   • साधु   •

कनिष्क के काल में बौद्ध धर्म ने उसी प्रकार उन्नति की जिस प्रकार सम्राट अशोक के काल में

कनिष्क के काल में बौद्ध धर्म ने उसी प्रकार उन्नति की जिस प्रकार सम्राट अशोक के काल में

कुषाण मौर्य काल में भारत आने वाले प्रमुख विदेशी जातियों में से एक थी ,और यह लोग मूलतः मध्य एशिया "यू ची " जाति की एक शाखा थी ,चीन के प्रसिद्ध इतिहास कार सु मा चीन के अनुसार यह जाती दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में पश्चिम चीन में निवास करते थे ,कुई शुआंग राज्य पर इनका अधिकार था ,लगभग 163 ईसा पूर्व में इन पर हिंग नू कबीले ने आक्रमण कर दिया था ,और इनके राजा यु ची को मार दिया ,और यह लोगो ने अपनी विधवा रानी के नेतृत्व में वु सुन प्रदेश पर अधिकार कर लिया सरदारिया से ताहिया पहुंचे ,ताहिया और बैक्टीरिया सोग्दियाना पर उन्होंने आक्रमण कर दिया जहा हिन्दी यूनानियों लोग राज करते थे ,और उन्हें जीत लिया किन- ची को अपनी राजधानी बनाया
206-220ई तक कुषाणों का इतिहास चीनी ग्रन्थ हान शू या तथा हाउ हान शू में मिलता है ,इस ग्रन्थ के अनुसार चु ची की एक शाखा सोग्दियाना पहुचने से पूर्व अपनी बड़ी शाखा से अलग हो कर तिब्बत की और चली गयी ,शेष पांच शाखाओं कुई शुआंग या कुषाण ,हीउ यी शुअांग्मी ,सितुं और तुमी को उनके एक सरदार क्यू क्यू कियो या कुजुल कडफाइसिस कुई शुआंग या कुषाण समाज की अध्क्षता में संघटित कर सम्राट बन गया

कुजुल कडफ़ाइसिस ने 15-65 ई तक राज किया और सचधर्मनिष्ट अभिलेख के अनुसार इस का धर्म शैव या बौद्ध था ,इस के बाद विम कदफिसस शासक बना जो कुजुल कडफ़ाइसिस का बेटा था और उस का काल 65 -78ई तक रहा और यह शैव मत को मानता था

इसके अतिरिक्त बौद्ध अनुश्रुति में भी कनिष्क को बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। बौद्ध धर्म में उसका स्थान अशोक से कुछ ही कम है। जिस प्रकार अशोक के संरक्षण में बौद्ध धर्म की बहुत उन्नति हुई, वैसे ही कनिष्क के समय में भी हुई।

इस के बाद सम्राट कनिष्क राजा बने कनिष्क को कुषाण वंश का तीसरा शासक माना जाता था किन्तु राबाटक शिलालेख के बाद यह चौथा शासक साबित होता है। संदेह नहीं कि कनिष्क कुषाण वंश का महानतम शासक था। उसके ही कारण कुषाण वंश का भारत के सांस्कृतिक एवं राजनीतिक इतिहास में महत्त्वपूर्ण स्थान है। उसका राज्यारोहण काल संदिग्ध है। 100 ई. से 127 ई. तक इसे कहीं पर भी रखा जा सकता है, किन्तु सम्भावना यह भी मानी गई थी कि तथाकथित शक संवत, जो 78 ई. में आरम्भ हुआ माना जाता है, कनिष्क के राज्यारोहण की तिथि हो सकती है। कनिष्क के राज्यारोहण के समय कुषाण साम्राज्य में अफ़ग़ानिस्तान, सिंध का भाग, बैक्ट्रिया एवं पार्थिया के प्रदेश सम्मिलित थे। कनिष्क ने भारत में अपना राज्य मगध तक विस्तृत कर दिया।

किंवदंतियों के अनुसार कनिष्ठक पाटलिपुत्र पर आक्रमण कर अश्वघोष नामक कवि तथा बौद्ध दार्शनिक को अपने साथ ले गया था और उसी के प्रभाव में आकर सम्राट् की बौद्ध धर्म की ओर प्रवृत्ति हुई और उन्होंने बुद्ध धर्म अपना लिया ,इस से पहले वे मुख्य रूप से मिहिर (सूर्य) के उपासक थे। सूर्य का एक पर्यायवाची 'मिहिर' है,

सम्राट कनिष्क के काल में कनिष्क के संरक्षण में बौद्ध धर्म की चौथी संगीति (महासभा) उसके शासन काल में हुई। कनिष्क ने जब बौद्ध धर्म का अध्ययन शुरू किया, तो उसने अनुभव किया कि उसके विविध सम्प्रदायों में बहुत मतभेद है। धर्म के सिद्धांतों के स्पष्टीकरण के लिए यह आवश्यक है, कि प्रमुख विद्वान एक स्थान पर एकत्र हों, और सत्य सिद्धांतों का निर्णय करें। इसलिए कनिष्क ने काश्मीर के कुण्डल वन विहार में एक महासभा का आयोजन किया, जिसमें 500 प्रसिद्ध बौद्ध विद्वान सम्मिलित हुए। अश्वघोष के गुरु आचार्य वसुमित्र और पार्श्व इनके प्रधान थे। वसुमित्र को महासभा का अध्यक्ष नियत किया गया। महासभा में एकत्र विद्वानों ने बौद्ध धर्म के सिद्धांतों को स्पष्ट करने और विविध सम्प्रदायों के विरोध को दूर करने के लिए 'महाविभाषा' नाम का एक विशाल ग्रंथ तैयार किया। यह ग्रंथ बौद्ध त्रिपिटक के भाष्य के रूप में था। यह ग्रंथ संस्कृत भाषा में था और इसे ताम्रपत्रों पर उत्कीर्ण कराया गया था। ये ताम्रपत्र एक विशाल स्तूप में सुरक्षित रूप से रख दिए गए थे। यह स्तूप कहाँ पर था, यह अभी तक ज्ञात नहीं हो सका है। यदि कभी इस स्तूप का पता चल सका, और इसमें ताम्रपत्र उपलब्ध हो गए, तो निःसन्देह कनिष्क के बौद्ध धर्म सम्बन्धी कार्य पर उनसे बहुत अधिक प्रकाश पड़ेगा। 'महाविभाषा' का चीनी संस्करण इस समय उपलब्ध है।

इस के अलावा मथुरा और गन्धरा मूर्ति कला को भी बड़ा प्रोत्साहन दिया ,सम्राट कनिष्क के काल में ही बौद्ध धर्म भारत से निकल कर चीन और दक्षिण - पूर्व एशिया में फैला और इस का श्रेय कनिष्क को ही दिया जाना चाहिए की उन्होंने बुद्ध धर्म के प्रकाश से पुरे दक्षिण - पूर्व एशिया को रोशन कर दिया ,उनके काल में बोहत से बुद्ध स्तूप बने लेकीन अभी मिले स्तुपो ने उनका प्रसिद्ध स्तूप है पेशावर के पास मिला कनिष्का स्तूप उनके काल में बौद्ध धर्म ने उसी प्रकार उन्नति की जिस प्रकार सम्राट अशोक के काल में उन के समय में बौद्ध धर्म इराक ,ईरान और पूरे चीन और दक्षिण - पूर्व एशिया में फैला ,सम्राट कनिष्क के समय ने बुद्ध को उन्होंने अपने सिक्को पर भी आंकित करवाया ,और पुरे राज्य में हज़ारो बौद्ध स्तुपो का निर्माण करवाया ,जिस आज भी उनके प्रभाव वाले क्षेत्र में देखा जा सकता है

आज भी पाकिस्तान और अफगानिस्तान या भारत के पंजाब और हरियाणा में पाये जाने वाले ज्यादा तर बौद्ध स्मारक कनिष्क काल के ही है ,इन में से ज्यादा तर स्मारक तबाह हो गए है ,क्यों की पंजाब के रस्ते भारत पर बहुत विदेशी आक्रमण हुए और आक्रमकारी  इन सब स्मारकों को तबाह करते हुए ही आगे बढ़ाते थे ,लेकीन इन के निशान आज भी इन इलाको में देखे जा सकते है ,इस के अलावा गांधार और मथुरा काला में बुद्ध की मुर्तिया भी सम्राट कनिष्का का ही योगदान है ,उन की राजधानी पेशावर और मथुरा थी 

आज सम्राट कनिष्क के वंशज भारत में गुर्जर के नाम से जाने जाते हैअगर हम गुर्जर शब्द को चीनी भाषा में लिखेंगे को सम्राट कनिष्क के कबीले "यू ची "का नाम बनेगा ,जो गुर्जर या यू ची का संस्कृत में बिगाड़ा हुआ रूप है

Monday, January 4, 2016

बोधिवृक्ष की महत्वपूर्ण जानकारी

बोधिवृक्ष की महत्वपूर्ण जानकारी
========================

** तथागत बुद्ध को इ.स.पुर्व 528 (वैशाख पुर्णिमा) में बोधगया में पिपल बोधिवृक्ष के निचे ज्ञागप्राप्ती हुईं और वे सम्यक संबुद्ध बने।
******************************

मुल बोधिवृक्ष का पहला उत्तराधिकारी ------------------------------
   तथागत बुद्ध श्रावस्ती छोड़कर दुसरी जगह न जए ऐसा श्रावस्ती के लोगों को लगता था। आखिरकार तथागत बुद्ध ने श्रावस्ती छोड़ने का संकल्प उन्हें (श्रावस्तीवासियों) को पता चला इसलिए वे बेहद दुःखी और बेचैन हुए। " तथागत की याद सदा के लिए श्रावस्ती में रहे इसलिए बोधगया के बोधिवृक्ष की एक टहनी श्रावस्ती में लाकर लगाई जाएँ।" ऐसी उन्होंने तथागत से बिनती की।
   सभी लोगों की श्रद्धा को देखकर खुद तथागत बुद्ध ने बोधिवृक्ष की टहनी लाने के लिए आनंद को बोधगया भेजा। आनंद बोधगया जाकर वहाँ बोधिवृक्ष की विधिवत पुजा करके एक टहनी श्रावस्ती मे लाकर तथागत बुद्ध के आदेशानुसार उस टहनी को श्रावस्ती के जेतवन में विधिवत रूप से लगाया। आज इस वृक्ष को ' आनंद बोधिवृक्ष' कहाँ जाता हैं।
~~~~~~~
मुल बोधिवृक्ष का दुसरा उत्तराधिकारी
------------------------------
  सम्राट अशोक ने अपने पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा इन्हें दिक्षा लेने के लिए कहकर उन्हें धम्म का प्रचारक बनाया। सम्राट अशोक ने संघमित्रा के साथ बहोत से भिक्खू और भिक्खुनिओ को बोधगया के मुल बोधिवृक्ष की एक टहनी देकर उसे धम्मप्रचार करने के लिए श्रीलंका भेजा। संघमित्रा ने श्रीलंका की राजधानी अनुराधापूर में बोधिवृक्ष की उस टहनी को लगाया।

***** आज श्रीलंका के बोधिवृक्ष की ही शाखाएँ (टहनी) वाराणसी, सांची, सारनाथ, दिल्ली और दिक्षाभूमी नागपूर में लगाई गईं हैं। साथ ही उसी बोधिवृक्ष की एक एक टहनी नई दिल्ली के बुद्ध जयंती पार्क और डाॅ.बाबासाहेब आंबेडकर भवन, दिल्ली के भारतीय बौद्ध महासभा के कार्यालय के प्रांगण में सन 1956 में लगाई थी।

******************************

मुल बोधिवृक्ष पर पहला आघात
-------------------------
    सम्राट अशोक असीम श्रद्धा के साथ बोधगया के पावन बोधिवृक्ष के निचे बारबार जाकर वहाँ बहोत देर तक चिंतन और मनन करते थे। सम्राट अशोक की यह बात उनकी एक राणी तिष्यरक्षिता को पसंद नहीं थी।  उसे लगता था की सम्राट अशोक बारबार बोधिवृक्ष के पास जाकर अपना अधिकाधिक समय वहाँ देते हैं इस वजह से उनका (सम्राट अशोक) ध्यान अपनी ओर नहीं लगता। तिष्यरक्षिता के मन सम्राट अशोक के बारबार बोधिवृक्ष के पास जाने से घृणा पैदा होती थी और वे इसका हरवक्त विरोध करती थी।
    राजा का स्वभाव बदल रहा हैं और इसके लिए बोधिवृक्ष ही जिम्मेदार हैं ऐसा सोचकर एक दिन " बोधगया के बोधिवृक्ष को जड़ से तोड़ा जाए इससे राजा उस जगह पर बारबार नहीं जाएंगे, " ऐसा विचार तिष्यरक्षिता राणी के मन में आया।
  राणी ने सम्राट अशोक को न बताते हुए बोधगया के बोधिवृक्ष को जड़ों से काटकर और उसके टहनीयों के टुकड़े करो ऐसा अपने विश्वासू सेवकों को आदेश दिया और द्वेष भावना से उसने सेवकों के हाथों से बोधगया के मुल बोधिवृक्ष को जड़ से तोड़कर उसकी टहनीयों के टुकड़े टुकड़े करके उसे नष्ट किया।
   इसका सम्राट अशोक को पता चला तो वे बेहद दुःखी हुए।
   सम्राट अशोक बोधगया जाकर उन्होंने बोधिवृक्ष के बुंधा (the trunk; stump) को मन की श्रद्धा त्रिवार वंदन किया और उसपर गाय का दूध, सुगंधित पाणी डालकर सुगंधित पुष्प, धुप, दीप के साथ मन से पूजा वंदना करके चिंतन किया। यह कार्य बहोत दिनों तक शुरू रहा। आखिरकार कुछ ही दिनों में प्रकृति के नियम के अनुसार बुंधे से (the trunk; stump) एक अंकुर आया (to sprout) और उससे ही एक बड़ा बोधिवृक्ष तयार हुआ।
~~~~~~~~~~~

मुल बोधिवृक्ष पर दुसरा आघात
-------------------------
   पूर्व बंगाल (गौरप्रदेश) का राजा शशांक (इ.स. 606 से 637) यह बौध्द धम्म का कड़ा विरोधक था। उसने बोधगया पर हमला किया। तब उसने सबसे पहले बोधिवृक्ष पर हमला करके सैनिकों द्वारा बोधिवृक्ष की जमीन को खोदकर उसे जड़ से तोड़ा और उसकी टहनीयों के छोटेछोटे टुकड़े करके उसे और बोधिवृक्ष के पत्तों को जलाया साथ ही उस जगह पर वो वृक्ष दोबारा न निकले और वो जगह बंजर हो जाए इसलिए उसने उस खोदे हुए गड्डे में गन्ने का रस डालकर उसे जलाया था।
   शशांक के हमलों का समाचार सुनकर अशोक के वंश का मगध का आखिरी राजा पूर्णवर्मा बहोत दुःखी हुए। पूर्णवर्मा ने बोधिवृक्ष के बुंधे (the trunk; stump) पर सम्राट अशोक जैसी कृती करके श्रद्धा से पुजा की। पहले जैसे ही बुंधे (the trunk; stump) के जड़ों से एक अंकुर (to sprout) उपर आया और पुनः वहाँ बड़ा बोधिवृक्ष तयार हुआ।
~~~~~~~~~~~~

मुल बोधिवृक्ष पर तिसरा आघात
--------------------------
    भारत में अंग्रेजो का शासन था। तब सन 1880 में महाबोधि विहार के परिसर का उत्खनन (खुदाई) कार्य अंग्रेज पुरातत्व विभाग का व्यक्ति जनरल कनिंगहॅम इन्होंने चारों बाजू से बहोत गहराई तक किया। इस वजह से बोधिवृक्ष के अगलबगल के जमीन के चारों ओर का आधार बहोत कम हुआ। उसवक्त एक बड़ा तुफान आया था और उसी तुफान से वो महान, विशाल बोधिवृक्ष जमीन पर गिर पड़ा।
   इस घटना का पुरे विश्व के बौद्धों को बहोत दुःख हुआ। उसवक्त सभी बौद्ध राष्ट्रों के प्रतिनिधि बोधगया आएं। उन्होंने अंग्रेज सरकार और कॅनिंगहॅम की कड़ी आलोचना की। बोधिवृक्ष के पतन से तथागत बुद्ध का स्मृति प्रतिक नष्ट न हो इसलिए सभी राष्ट्रों के प्रतिनिधियों ने एकमत से सोचकर श्रीलंका के मुल बोधिवृक्ष की एक टहनी लाकर उसे विधिवत तरीके से मुल बोधिवृक्ष की जगह पर उसे पुनः लगाया गया।
   आगे कुछ सालों बाद वह टहनी बड़ी होकर उसका बड़ा विशाल बोधिवृक्ष तयार हुआ। आज बोधगया में जो बोधिवृक्ष हैं वो श्रीलंका के मुल बोधिवृक्ष (बोधगया के मुल बोधिवृक्ष का उत्तराधिकारी) की एक टहनी से ही बड़ा हुआ बोधिवृक्ष हैं।
========================
संदर्भ :-
तथागत आणि बौद्ध स्थळांचा इतिहास
लेखक :- पी.जी.रायबोले 'शीलवंश'
हिन्दी अनुवाद:- अमित इंदूरकर
(इस महत्वपूर्ण जानकारी का हिन्दी अनुवाद करते समय कुछ त्रुटियाँ भी हो सकती हैं इसलिए हमे माफ करना)
✒अमित इंदूरकर

Followers

Books of Dr. Ambedkar

Books of Dr. Ambedkar

Books on Dr. Ambedkar

Books on Dr. Ambedkar

Baudh Sthal

Baudh Sthal

Buddhist Children

Buddhist Children

Buddhist Monks

Buddhist Monks

Pali Language

Pali Language

Business Books

Business Books

T-shirt

T-shirt

English Books

English Books